दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती (हिन्दी में अर्थ सहित)

जय माता दी…! HindiMeStatus.com पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है| आपको यह जानकर बहुत खुशी होगी की हम आपके लिए लेकर आये है दुर्गा चालीसा हिन्दी में अर्थ सहित तो चलिये लेख पढ़ना शुरू करते है.

दुर्गा, माँ पार्वती का दूसरा नाम है, माँ दुर्गा हिन्दुओं की प्रमुख देवी हैं जिन्हें केवल देवी और शक्ति भी कहते हैं.

माँ के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है| पीताम्बर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्थचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं.

शेर हमेशा माता के साथ रहता है| माँ दुर्गा के नौ अलग – अलग रूप है इसलिए उन्हे नौ देवी भी कहा जाता है.

माँ दुर्गा की लीला और महिमा अपरंपार है| भारत के अंदर माँ दुर्गा के अनेकों मंदिर है जिसमें से सबसे प्रसिद्ध है वैष्णो देवी| जहां माँ ने अपने भक्तजनों को कई सारे चमत्कार दिखाए थे और वैष्णो देवी के मंदिर की स्थापना तकरीबन 700 साल पहले हुई थी.

वैष्णो देवी ही माँ दुर्गा का रूप है|

मां दुर्गा जी की पूजा में दुर्गा चालीसा का पाठ किया जाता है इसलिए हम आपके लिए लेकर आये है दुर्गा चालीसा अर्थ सहित हिन्दी में|

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Maa Durga Chalisa in Hindi – दुर्गा चालीसा हिंदी में

Durga Chalisaa - दुर्गा चालीसा

|| नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥

अर्थ: सुख प्रदान करने वाली
श्री दुर्गा जी को नमस्कार है| दुख का हरण
करने वाली श्री अम्बा जी को नमस्कार

|| निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूं लोक फैली उजियारी ॥

अर्थ: आपकी ज्योति का प्रकाश निरंकार
अर्थात असीम और सर्वव्यापी है जिससे
तीनों लोको (पृथ्वी, आकाश, पाताल) मे
उजियाला फैल रहा है

|| शशि लिलाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥

अर्थ: आपका मस्तक चंद्रमा के समान और मुँह की
शोभा अति विशाल है| नयन लाल आभा से
युक्त और भवें (भूकुटियाँ) विकराल रूप
वाली है

|| रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥

अर्थ: माता का यह रूप अत्यंत सुहावना है|
इसके दर्शन मात्न से न्हाक्त जनो को
अत्यंत सुख मिलता है

|| तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अर्थ: तुमने संसार की सभी शक्तियों को अपने मे
समेटा हुआ है और जगत के पालन करने के
लिए अन्न और धन प्रदान किया है

|| अन्नपूरना हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

अर्थ: अन्नपूर्णा का रूप धारण कर आप जगत का
पालन करती है और आप ही आदि (प्राचीन)
बाला सुंदरी रूप धारणा करती है

|| प्र्लयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥

अर्थ: प्रलयकाल मे आप ही सबका नाश
करने वाली है| शिव शंकर की प्रिय
गौरी पार्वती आप ही है|

|| शिव योगी तुमरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

अर्थ: शिव तथा योगीजन आपका गुणगान
करते है और ब्रह्मा विष्णु देवता भी नित्य ही
आपका ध्यान करते है

|| रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥

अर्थ: आपने ही श्री सरस्वती जी का रूप धारण
करके ऋषि-मुनियो को सद्-बुद्धि प्रदान कर
उनका उद्धार किया है

|| धरयो रूप नरसिंह को अम्बा । प्रगट भई फाड़ कर खम्बा ॥

अर्थ: है अम्बा माता! आप ही श्री नरसिंह का रूप
धारण कर खम्बे से प्रकट हुई थी|

|| रक्षा करि प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥

अर्थ: इस प्रकार आपने प्र्हलाद की भी रक्षा करी
तथा हिरणकश्यपु को भी स्वर्ग मिला
क्योंकि वह आपके द्वारा ही मारा गया था|

|| लक्ष्मी रूप धरा जग माहीं । श्री नारायण अंग समाही ॥

अर्थ: लक्ष्मी जी का रूप धारण कर आप ही संसार
मे श्री नारायण के संग मे विराजमान है|

|| क्षीरसिंधु में करत विलासा । दया सिन्धु दीजै मन आसा ॥

अर्थ: भगवान विष्णु जी के साथ क्षीर सागर मे
विराजमान है दयासिंधु देवी! मेरी आशाओ
को पूर्ण करो

|| हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥

अर्थ: हिंगलाज की प्रसिध्द देवी भी भवानी आप ही
है| आपकी आपार महिमा का बखान भी
नहीं किया जा सकता|

|| मातंगी अरु धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥

अर्थ: मातंगी और घूमावती माता आप स्वयं ही है|
भुवनेशरी और बगलामुखी देवी के रूप मे
आप जी सुखदाता है|

|| श्री भैरव तारा जग तारिणि । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणि ॥

अर्थ: श्री भैरवी और तारादेवी के रूप मे आप ही
जगत का उद्धार करती है| छिन्नमस्ता देवी के
रूप मे आप भवसागर के दुखो का
निवारण करती है

|| केहरी वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

अर्थ: केहरी (सिंह) वाहन (सवारी) पर
सोभयमान आप भवानी जी है और लांगुर
जैसे वीर आपकी अगवानी करते है|

|| कर में खप्पर खड्ग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ॥

अर्थ: आपके हाथ मे जब खड्ग और खप्पर
(काली के रूप मे) होता है तो उसे देख कर
काल भी डर कर भाग खड़ा होता है

|| सोहे अस्त्र और त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

अर्थ: विभिन्न अस्त्र – सस्त्र और त्रिशूल उठाये हुए
आपके रूप को देख कर शत्रु के हृदय मे स्वयं
ही पीड़ा उठने लगती है

|| नगर कोटि में तुम्हीं विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत ॥

अर्थ: नगरकोट कांगड़े वाली देवी के रूप मे आप
ही विराजमान है| इस प्रकार तीनों लोक मे
आपका ही डंका बज रहा है|

|| शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्त बीज शंखन संहारे ॥

अर्थ: शंभू और निशुम्भ जैसे दानवो का वध
आपने ही किया और रक्त बीज का भी
हजारो की संख्या मे नाश किया|

||महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अध भार मही अकुलानी ॥

अर्थ: अत्यंत अभिमानी महिषासुर के पापो के भार
से जब धरती व्याकुल हो उठी|

|| रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

अर्थ: तब काली का विकराल रूप धारण करके
आपने सेना सहित उसका संहार कर दिया

|| परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अर्थ: इस प्रकार संत जनों पर जब-जब विपत्तियां
आई तब – तब है माता आपने ही
सहायता की है|

||अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहे अशोका ॥

अर्थ: जब तक अमरपुरी (देव – लोक) और
अन्य लोक है तब तक आपकी महिमा से सब
शोक रहित रहेंगे|

|| ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥

अर्थ: श्री ज्वाला जी मे आपका ही ज्योति
जल रही है| नर – नारी सदा आपकी ही
पुजा करते है|

||प्रेम भक्ति से जो यश गावे । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ॥

अर्थ: प्रेम और भक्तिपूर्वक जो भी व्यक्ति आपके
यश का गायन करता है, दुख व दरिद्र उसके
निकट नहीं आते है|

||ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई ॥

अर्थ: जो व्यक्ति निष्ठापूर्वक आपका ध्यान करता
है उसका जन्म – मरण का बंधन निश्चित ही
छुट जाता है|

|| जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

अर्थ: योगी – देवता और मुनिजन पुकार – पुकार कर
कहते है की आपकी शक्ति (कृपा) के बिना
योग भी असंभव है|

|| शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥

अर्थ: शंकराचार्य ने आचरज नामक ताप किया
और काम, क्रोध इत्यादि

|| निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

अर्थ: उन्होने नित्य ही शंकर भगवान का ध्यान
किया लेकिन आपका स्मरण किसी
पल नहीं किया||

|| शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो ॥

अर्थ: आपकी शक्ति का उन्होने मर्म (भेद) नहीं
जाना, (इसलिए) उनकी शक्ति छिन गयी
और तब वह मन ही मन पछताने लगे|

|| शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

अर्थ: आपकी शरण मे जब आकार कीर्ति का
बखान किया और जय – जय – जय जगदंबा
भवानी का उच्चारण किया|

|| भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

अर्थ: तब हे आदि जगदंबा जी! अपने प्रसन्न
होकर उनकी शक्ति उन्हे लौटने मे विलंम्ब
नहीं किया|

|| मोको मात कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ॥

अर्थ: हे माता! मुझे बहुत से कष्टो ने घेर रखा है
आपके अतिरिक्त इन इन दुखो को कौन दूर
कर सकेगा? अर्थात आप ही मेरे कष्टो को दूर
करे|

|| आशा तृष्णा निपट सतावै । मोह मदादिक सब विनशावै ॥

अर्थ: आशा तृष्णा तो निरंतर सताती ही है, मोह,
मद आदि (काम, क्रोध, इशर्या, मोह, अहंकार)
भी सब दुखी करते है|

|| शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ॥

अर्थ: हे भवानी! मैं एक चित होकर आपका
स्मरण करता हूँ| आप मेरे शत्रुओ का
नाश कीजिये|

|| करो कृपा हे मात दयाला । ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥

अर्थ: है दया बरसाने वाली माता! मुझ पर कृपा
कीजिये और ऋद्धि – सिद्धी प्रदान कर मुझे
निहाल करे|

|| जब लगी जियौ दया फल पाऊं । तुम्हारो यश मैं सदा सुनाऊं ॥

अर्थ: हे माता! मे जब तक जीवित रहूँ आपकी दया
का पात्न बना रहूँ और आपके यश की कथा
सबको सुनता रहूँ|

|| दुर्गा चालीसा जो जन गावे । सब सुख भोग परमपद पावे ॥

अर्थ: इस प्रकार जो भी दुर्गा चालीसा गायेगा
(अर्थात पाठ करेगा) वह सब सुखो को
भोगता हुआ परमपद को प्राप्त होगा|

|| देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

अर्थ: आपकी शरण मे आये इस दास पर कृपा करे
माँ जगदंबा भवानी|

माँ दुर्गा चालीसा का पाठ – Maa Durga Chalisa Ka Path

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तन बीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

आभा पुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपु मुरख मोही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।
जब लगि जियऊं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥इति श्रीदुर्गा चालीसा सम्पूर्ण॥

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आप सभी पर हमेशा माँ दुर्गा की कृपया बनी रहे जय महाकाल 🙂

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